सांप के जहर मामले में यूट्यूबर एल्विश यादव को SC ने दी बड़ी राहत, रद्द की FIR

Edited By suman prajapati, Updated: 19 Mar, 2026 02:05 PM

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यूट्यूबर एल्विश यादव सांप के जहर मामले में बड़ी राहत मिली है।  सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है, जिसमें उन पर वीडियो शूट के दौरान सांप के जहर के इस्तेमाल और कथित रेव पार्टियों में ड्रग्स से जुड़े आरोप लगाए गए थे।

मुंबई. यूट्यूबर एल्विश यादव सांप के जहर मामले में बड़ी राहत मिली है।  सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है, जिसमें उन पर वीडियो शूट के दौरान सांप के जहर के इस्तेमाल और कथित रेव पार्टियों में ड्रग्स से जुड़े आरोप लगाए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि उन्होंने मामले को केवल कुछ सीमित कानूनी बिंदुओं के आधार पर परखा है। अदालत ने पाया कि दर्ज की गई एफआईआर कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है, इसलिए इसे निरस्त किया जाना उचित है।

NDPS एक्ट लागू करने पर सवाल
मामले में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस (NDPS) एक्ट के तहत कार्रवाई की गई थी। सुनवाई के दौरान यह तर्क रखा गया कि सह-आरोपी से बरामद कथित पदार्थ, जो सांप के जहर से संबंधित एंटीडोट बताया गया, NDPS एक्ट की सूची में शामिल नहीं है। अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए माना कि जिस पदार्थ का जिक्र किया गया है, वह कानून की निर्धारित श्रेणी में नहीं आता।

 

 

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एल्विश यादव के पास से कोई प्रत्यक्ष बरामदगी नहीं हुई थी और चार्जशीट में केवल यह आरोप था कि उन्होंने एक सहयोगी के माध्यम से ऑर्डर दिए थे। इन परिस्थितियों में NDPS एक्ट का इस्तेमाल करना कानूनी रूप से उचित नहीं पाया गया।

वन्यजीव संरक्षण कानून पर भी टिप्पणी
मामले का दूसरा पहलू वन्यजीव संरक्षण कानून से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत मुकदमा तभी शुरू किया जा सकता है, जब शिकायत किसी अधिकृत अधिकारी द्वारा दर्ज की गई हो। यहां एफआईआर एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दर्ज की गई थी, जो एक पशु कल्याण संगठन से जुड़ा था, लेकिन उसे कानूनी रूप से ऐसा करने का अधिकार नहीं था।

 

एफआईआर को माना गया कमजोर
अदालत ने यह भी कहा कि एफआईआर अपने वर्तमान स्वरूप में जांच के योग्य नहीं है, क्योंकि यह आवश्यक कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतरती। साथ ही, शिकायतकर्ता की मंशा को लेकर भी सवाल उठाए गए। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि भारतीय दंड संहिता के तहत लगाए गए आरोप स्वतंत्र रूप से मजबूत नहीं बनते, क्योंकि वे एक पुराने मामले से जुड़े थे जिसे पहले ही बंद किया जा चुका था।

मूल आरोपों पर नहीं की टिप्पणी
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उसने मामले के मूल आरोपों की सच्चाई या झूठ पर कोई टिप्पणी नहीं की है। फैसला केवल कानूनी आधारों पर लिया गया है।
 

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